इतना ख़ुश रंग कि ख़ाबों का नगर लगता है

इतना ख़ुश रंग कि ख़ाबों का नगर लगता है
गुनबद-ए-सबज़ से ये शहर गुहर लगता है

माज़रत अहल-ए-मदीना ये जसारत है मगर
एक हस्ती के तुफ़ैल अपना ही घर लगता है

पांव आक़ा ने इन्ही गलीयों में रखे होंगे!
पांव रखते हूए ईमान से डर लगता है

पलकें झाड़ू के तसव्वुर से दमक उठती हैं
रास्ता आप की गर राह गुज़र लगता है

हिज्र  में आप के नमनाक फ़क़त आंख नहीं
ख़ून से सीने में कुछ और भी तर लगता है

ताअत-ए-अहमद-ए-मुरसल का शजर दिल में लगा
इस पे जन्नत की बशारत का समर लगता है

नाज़ हो जिस को मुहम्मद की गु़लामी पर क़ैस
आंख वालों को वो-ही अहल-ए-नज़र लगता है
#शहज़ाद क़ैस

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