अज़ल से मुअज़्ज़म है नाम-ए-मुहम्मद

अज़ल से मुअज़्ज़म है नाम-ए-मुहम्मद
फ़रिश्तों से पूछो मुक़ाम-ए-मुहम्मद

बशर अह्द-ए-तिफ़ली से बाहर तो निकले
करेंगे सभी एहतिराम-ए-मुहम्मद

मुहम्मद के दुश्मन हैं ता हश्र अबतर
ख़ुदा ख़ूब ले इंतिक़ाम-ए-मुहम्मद

ख़ुलासा मुकम्मल शरीयत का लिख लो
हलाल-ए-मुहम्मद, हराम-ए-मुहम्मद

ज़कात अब भी पहुंचे ग़रीबों को घर पर
मोअस्सर तरीन इंतज़ाम-ए-मुहम्मद

बहुत हो चुकी, अब फ़क़त एक नारा
निज़ाम-ए-मुहम्मद, निज़ाम-ए-मुहम्मद

ख़ुदा लैला और क़ैस को भी बना दे
कनीज़-ए-मुहम्मद, गुलाम-ए-मुहम्मद
#शहज़ाद क़ैस

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