एक तजल्ली है मुस्तफ़ा उस की

एक तजल्ली है मुस्तफ़ा उस की
और किया लिखूं में सना उस की

मामता जिस की " एक नेअमत है
दिल मिरे हम्द  तो सुना उस की

" आल़्ला शाफ़ी का मानी ये है दोस्त!
हर मर्ज़ मेरा, हर शिफ़ा उस की

सरफ़राज़ी को, उम्र भर तरसा
सर जो चौखट पे ना झुका उस की

एक पत्थर ने, आदमी से कहा
तू भी कुछ हम्द  गुनगुना उस की

इल्म, इरफ़ान, अक़्ल शिशदर हैं
इंतिहा पर है इब्तिदा उस की

क़ैस जो झूम कर ये हम्द  पढ़े
उम्र दुगनी करे ख़ुदा उस की
शहज़ाद क़ैस

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