पिलाता है हक़ जिस को जाम-ए-मुहम्मद

पिलाता है हक़ जिस को जाम-ए-मुहम्मद
वुह अश्कों से लिखता है नाम-ए-मुहम्मद

खुर्द, इशक़, तालीम, तक़्वा है लाज़िम
सभी कैसे समझें मुक़ाम-ए-मुहम्मद

दुरूद उन पे जब जब पढ़ें भीगी आखें
उतरता है दिल पर सलाम-ए-मुहम्मद

इबादत की मेराज, सुब्हान रबी
ख़ुदा ने किया कम क़ियाम-ए-मुहम्मद

कलाम-ए-मुहम्मद, बहुक्म-ए-ख़ुदा है
कलाम-ए-ख़ुदा है कलाम-ए-मुहम्मद

मुझे काश मह्शर में सहूवन ही समझें
गुलाम-ए-गुलाम-ए-गुलाम-ए-मुहम्मद

ख़ुदा हश्र में उस पे रहमत करे गा
है जिस दिल में क़ैस एहतिराम-ए-मुहम्मद
शहज़ाद क़ैस

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