अक़्ल से ज़ात, मावरा उस की

अक़्ल से ज़ात, मावरा उस की
क्या लिखे गा, क़लम सना उस की

ज़र्रे ज़र्रे का दाइमी हाकिम
आग, मिट्टी, पवन, घटा उस की

तोहफ़े में उस को कुछ भी दे ना सका
जो भी सोचा था, थी अता उस की

हम फ़क़ीरों का क्या है दुनिया में
हत्ता कि ताकत-ए-दुआ उस की!

धड़कनों से लतीफ़ नग़मा था
दिल ने सुनने ना दी सदा उस की

हूर ओ-जन्नत तो " ज़िमनी बात थी दोस्त
काश तुम मांगते रज़ा उस की

शर्म कर कुछ गुनाह करने में
क़ैस बख़शिश ना आज़मा उस की!

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