रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

 

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी
वो हूर ज़ीना उतरते हुए सिखाने लगी

किताब बाब ग़ज़ल शेर बैत लफ़्ज़ हुरूफ़
ख़फ़ीफ़ रक़्स से दिल पर उभारे मस्त परी

कलाम अरूज़ तग़ज़्ज़ुल ख़याल ज़ौक़-ए-जमाल
बदन के जाम ने अल्फ़ाज़ की सुराही भरी

इस शेएर में लिख डाला है बुनियादी अक़ीदा

इस शेएर में लिख डाला है बुनियादी अक़ीदा
अहमद सा कोई दूसरा दीदा ना शनीदा

जिस कुन की है तख़लीक़ तिरी ज़ात-ए-मुअज़्ज़म्
उस कुन के फ़ज़ाइल का लिखे कौन जरीदा

है इल्म भी लाज़िम वलय ये ज़हन में रखना
पढ़ लिख के कोई होता नहीं अर्श रसीदा

कुन की अज़ान-ए-नाज़ का जौहर नबी मिरा

कुन की अज़ान-ए-नाज़ का जौहर नबी मिरा
ख़िलक़त की हर बहार का झूमर नबी मिरा

रोशन है कहकशाओं में हुसन-ए-मुहम्मदी
सोचो तो किस क़दर है मुनव्वर नबी मिरा

सय्यद, कलीम, उम्मी, मुहम्मद, क़वी, ख़लील
मंसूर, हक़, नज़ीर, मुतह्हर नबी मिरा

इतना ख़ुश रंग कि ख़ाबों का नगर लगता है

इतना ख़ुश रंग कि ख़ाबों का नगर लगता है
गुनबद-ए-सबज़ से ये शहर गुहर लगता है

माज़रत अहल-ए-मदीना ये जसारत है मगर
एक हस्ती के तुफ़ैल अपना ही घर लगता है

पांव आक़ा ने इन्ही गलीयों में रखे होंगे!
पांव रखते हूए ईमान से डर लगता है

मुहब्बत के दिलकश नगीने सलाम

मुहब्बत के दिलकश नगीने सलाम
मुबारक, मुक़द्दस महीने सलाम

ए क़ुरआन आवर, ए विजदान गिर
ए बख़शिश के रोशन ख़ज़ीने सलाम

अज़ानों की ठंडक, नमाज़ों की ख़ुशबू
बहुत रूह परवर  करीने सलाम

निगाहों में तौबा की रिम झिम के फूल
तिलावत से पुर नूर सीने सलाम

अजब रूह का मन ओ-सिल्वा है तू
करम ही करम के सफ़ीने सलाम

सिखाता है ग़लबा हमें नफ्स पर
तरक़्क़ी के पुर नूर ज़ीने सलाम

मना ले जो रब क़ैस रमज़ान में
कहें  उस को ग्यारह महीने सलाम
#शहज़ाद क़ैस

अज़ल से मुअज़्ज़म है नाम-ए-मुहम्मद

अज़ल से मुअज़्ज़म है नाम-ए-मुहम्मद
फ़रिश्तों से पूछो मुक़ाम-ए-मुहम्मद

बशर अह्द-ए-तिफ़ली से बाहर तो निकले
करेंगे सभी एहतिराम-ए-मुहम्मद

मुहम्मद के दुश्मन हैं ता हश्र अबतर
ख़ुदा ख़ूब ले इंतिक़ाम-ए-मुहम्मद

ख़ुलासा मुकम्मल शरीयत का लिख लो
हलाल-ए-मुहम्मद, हराम-ए-मुहम्मद

ख़ुशबू से रकम करता है गुल तेरा क़सीदा

ख़ुशबू से रकम करता है गुल तेरा क़सीदा
ताबिंदा सितारे सर-ए-दहलीज़ ख़मीदा

ख़ामा बनें अश्जार या अबहार स्याही
मर्क़ूम ना हो पाएंगे औसाफ़-ए-हमीदा

हर क़ल्ब कहाँ फ़ैज़ तिरी नाअत का पाए
हर ज़ेह्न् कहाँ इशक़ में हूऊए रमीदा

आक़ा तिरी रहमत के समुंद्र पे नज़र है
आमाल में सुस्ती है मगर पुख़्ता अक़ीदा

जो यहां ज़ेर हूवा सब को ज़बर लगता है

जो यहां ज़ेर हूवा सब को ज़बर लगता है
इस लिए सब से हसीन आप का दर लगता है

हम भी परदेस में जां जाने से डरते हैं हुज़ूर
पर मदीने में किसे मौत से डर लगता है

संग दिल शख़्स पे क़ुरआन मोअस्सर क्यों है ?
संग रेज़ों की तिलावत का असर लगता है

एक तजल्ली है मुस्तफ़ा उस की

एक तजल्ली है मुस्तफ़ा उस की
और किया लिखूं में सना उस की

मामता जिस की " एक नेअमत है
दिल मिरे हम्द  तो सुना उस की

" आल़्ला शाफ़ी का मानी ये है दोस्त!
हर मर्ज़ मेरा, हर शिफ़ा उस की

सरफ़राज़ी को, उम्र भर तरसा
सर जो चौखट पे ना झुका उस की

एक पत्थर ने, आदमी से कहा
तू भी कुछ हम्द  गुनगुना उस की

इल्म, इरफ़ान, अक़्ल शिशदर हैं
इंतिहा पर है इब्तिदा उस की

क़ैस जो झूम कर ये हम्द  पढ़े
उम्र दुगनी करे ख़ुदा उस की
शहज़ाद क़ैस

पिलाता है हक़ जिस को जाम-ए-मुहम्मद

पिलाता है हक़ जिस को जाम-ए-मुहम्मद
वुह अश्कों से लिखता है नाम-ए-मुहम्मद

खुर्द, इशक़, तालीम, तक़्वा है लाज़िम
सभी कैसे समझें मुक़ाम-ए-मुहम्मद

दुरूद उन पे जब जब पढ़ें भीगी आखें
उतरता है दिल पर सलाम-ए-मुहम्मद

इबादत की मेराज, सुब्हान रबी
ख़ुदा ने किया कम क़ियाम-ए-मुहम्मद

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